Thursday, August 13, 2020
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सीबीएसई के सिलेबस कट में भी राजनीतिक एजेंडा चलाने का आरोप, क्या कहते हैं विशेषज्ञ

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कोरोना काल में कक्षाओं के न चलने से छात्रों का काफी नुकसान हुआ है। परीक्षा परिणामों पर इसका असर न पड़े, इसके लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय के निर्देश पर सीबीएसई ने पाठ्यक्रम में 30 फीसदी तक की कटौती कर दी है। लेकिन इस पर कई राजनीतिक दलों की नाराजगी खुलकर सामने आ गई है। 

तृणमूल कांग्रेस नेता और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने नागरिकता और संघवाद जैसे महत्त्वपूर्ण टॉपिक को सिलेबस से हटाए जाने पर हैरानी जताई है। उन्होंने इस फैसले का विरोध करते हुए इस पर पुनर्विचार करने को कहा है। वहीं आम आदमी पार्टी ने इसे भाजपा का ‘राजनीतिक एजेंडा’ कहा है। 

आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने अमर उजाला से कहा कि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण मामला है कि सिलेबस से उन्हीं मुद्दों को हटाया गया है जिनके लिए समूचा विपक्ष लगातार लड़ाई लड़ रहा है। देश के हालात देखते हुए संघवाद, राष्ट्रवाद, नागरिकता और धर्मनिरपेक्षता जैसे मुद्दों को युवाओं को इस समय और अधिक समझने की जरूरत है, लेकिन सरकार इन्हीं मुद्दों को इस समय सिलेबस से हटा रही है। इससे उसकी मंशा पर सवाल खड़े होते हैं। 

हर चीज को राजनीतिक चश्मे से न देखे विपक्ष 

वहीं, भाजपा नेता सुदेश वर्मा ने कहा है कि विपक्ष को हर चीज को राजनीतिक नजरिये से नहीं देखना चाहिए। आपात स्थिति को देखते हुए यह परिवर्तन केवल एक वर्ष के लिए किया गया है। इस समय विपक्ष को देश को आगे बढ़ाने पर सकारात्मक सहयोग देना चाहिए और उसे छात्रों के विषय पर राजनीति नहीं करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि सेकुलरिज्म इस देश के रक्त में है और जब इस तरह के पाठ्यक्रम नहीं पढ़ाए जाते थे तब भी यह देश सेकुलर था और आगे भी रहेगा। 

पाठ्यक्रम निर्धारण बेहद तकनीकी विषय 

लेडी इरविन कॉलेज में डिपार्टमेंट ऑफ एजुकेशन की विभागाध्यक्ष एसोसिएट प्रोफेसर रेनू मालवीय ने कहा कि किसी कक्षा के किसी विषय के पाठ्यक्रम का निर्धारण सामान्य प्रक्रिया नहीं है। छात्रों के सर्वांगीण विकास को ध्यान में रखते हुए विशेषज्ञों की कमेटी कई बार की बैठकों के बाद इसका स्वरूप, विषय और तरीके पर फैसला करती है। सिलेबस में कटौती इस समय की मांग है, लेकिन ऐसा करने के दौरान भी पूरी प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए। 

इसमें भी सभी तकनीकी चीजों का ध्यान रखा जाता तो इससे छात्रों का नुकसान कम से कम होता। लेकिन आनन-फानन में किया गया फैसला छात्रों के लिए ज्यादा नुकसानदेह साबित हो सकता है। जहां तक पाठ्यक्रम के कम होने से छात्रों पर पड़ने वाले नुकसान की बात है, उसका असर छात्रों पर अवश्य पड़ेगा। विज्ञान जैसे विषयों में अगली कक्षाओं में विषय को समझने के साथ-साथ अन्य मामलों से भी छात्रों पर विषयवस्तु की कमी का असर पड़ता है। 

छात्रों में विषय की समझ पर पड़ेगा असर 

एनसीईआरटी से जुड़ीं शिक्षाविद प्रीती खन्ना ने कहा कि सिलेबस कट कहने के नाम पर 30 फीसदी हुआ है, लेकिन ज्यादातर मामलों में कहा जा रहा है कि असाइनमेंट और कुछ एक्टिविटीज के जरिए इसे पूरा कर दिया जाएगा। इसके आलावा, इकोनॉमिक्स, माइक्रोइकोनॉमिक्स जैसे तकनीकी विषयों में विषयवस्तु की कमी का असर छात्रों को भविष्य में नुकसान के रूप में देखना पड़ सकता है। 

सार

  • सीबीएसई के सिलेबस कट के फैसले को सही मानते हैं विशेषज्ञ
  • लेकिन उचित प्रक्रिया के तहत चाहते हैं पाठ्यक्रम में हो कटौती     
  • सीबीएसई ने पाठ्यक्रम में 30 फीसदी तक की कटौती कर दी है

विस्तार

कोरोना काल में कक्षाओं के न चलने से छात्रों का काफी नुकसान हुआ है। परीक्षा परिणामों पर इसका असर न पड़े, इसके लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय के निर्देश पर सीबीएसई ने पाठ्यक्रम में 30 फीसदी तक की कटौती कर दी है। लेकिन इस पर कई राजनीतिक दलों की नाराजगी खुलकर सामने आ गई है। 

तृणमूल कांग्रेस नेता और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने नागरिकता और संघवाद जैसे महत्त्वपूर्ण टॉपिक को सिलेबस से हटाए जाने पर हैरानी जताई है। उन्होंने इस फैसले का विरोध करते हुए इस पर पुनर्विचार करने को कहा है। वहीं आम आदमी पार्टी ने इसे भाजपा का ‘राजनीतिक एजेंडा’ कहा है। 

आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने अमर उजाला से कहा कि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण मामला है कि सिलेबस से उन्हीं मुद्दों को हटाया गया है जिनके लिए समूचा विपक्ष लगातार लड़ाई लड़ रहा है। देश के हालात देखते हुए संघवाद, राष्ट्रवाद, नागरिकता और धर्मनिरपेक्षता जैसे मुद्दों को युवाओं को इस समय और अधिक समझने की जरूरत है, लेकिन सरकार इन्हीं मुद्दों को इस समय सिलेबस से हटा रही है। इससे उसकी मंशा पर सवाल खड़े होते हैं। 

हर चीज को राजनीतिक चश्मे से न देखे विपक्ष 

वहीं, भाजपा नेता सुदेश वर्मा ने कहा है कि विपक्ष को हर चीज को राजनीतिक नजरिये से नहीं देखना चाहिए। आपात स्थिति को देखते हुए यह परिवर्तन केवल एक वर्ष के लिए किया गया है। इस समय विपक्ष को देश को आगे बढ़ाने पर सकारात्मक सहयोग देना चाहिए और उसे छात्रों के विषय पर राजनीति नहीं करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि सेकुलरिज्म इस देश के रक्त में है और जब इस तरह के पाठ्यक्रम नहीं पढ़ाए जाते थे तब भी यह देश सेकुलर था और आगे भी रहेगा। 

पाठ्यक्रम निर्धारण बेहद तकनीकी विषय 

लेडी इरविन कॉलेज में डिपार्टमेंट ऑफ एजुकेशन की विभागाध्यक्ष एसोसिएट प्रोफेसर रेनू मालवीय ने कहा कि किसी कक्षा के किसी विषय के पाठ्यक्रम का निर्धारण सामान्य प्रक्रिया नहीं है। छात्रों के सर्वांगीण विकास को ध्यान में रखते हुए विशेषज्ञों की कमेटी कई बार की बैठकों के बाद इसका स्वरूप, विषय और तरीके पर फैसला करती है। सिलेबस में कटौती इस समय की मांग है, लेकिन ऐसा करने के दौरान भी पूरी प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए। 

इसमें भी सभी तकनीकी चीजों का ध्यान रखा जाता तो इससे छात्रों का नुकसान कम से कम होता। लेकिन आनन-फानन में किया गया फैसला छात्रों के लिए ज्यादा नुकसानदेह साबित हो सकता है। जहां तक पाठ्यक्रम के कम होने से छात्रों पर पड़ने वाले नुकसान की बात है, उसका असर छात्रों पर अवश्य पड़ेगा। विज्ञान जैसे विषयों में अगली कक्षाओं में विषय को समझने के साथ-साथ अन्य मामलों से भी छात्रों पर विषयवस्तु की कमी का असर पड़ता है। 

छात्रों में विषय की समझ पर पड़ेगा असर 

एनसीईआरटी से जुड़ीं शिक्षाविद प्रीती खन्ना ने कहा कि सिलेबस कट कहने के नाम पर 30 फीसदी हुआ है, लेकिन ज्यादातर मामलों में कहा जा रहा है कि असाइनमेंट और कुछ एक्टिविटीज के जरिए इसे पूरा कर दिया जाएगा। इसके आलावा, इकोनॉमिक्स, माइक्रोइकोनॉमिक्स जैसे तकनीकी विषयों में विषयवस्तु की कमी का असर छात्रों को भविष्य में नुकसान के रूप में देखना पड़ सकता है। 



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