किस हद तक जा सकती है हैवानियत?

किस हद तक जा सकती है हैवानियत?

दरिंदगी की सीमाओं से परे भी ऐसा हो सकता है जिसकी मात्र कल्पना ही आप के दिल को झँझोड़ कर रख देगी। एक महज 12 साल की लड़की जिसकी दर्द और दुःख को समझने की उम्र ही नहीं थी, जिसने जिंदगी के रंगो को देखना शुरू ही किया था। जिसने शायद जिंदगी में कभी ऐसी कल्पना भी नहीं की होगी की दुनिया में ऐसे राक्षस लोग भी हो सकते है।

12 साल की नैंसी झा एक छोटी बच्ची जो बिहार के मधुबनी में रहती थी। अपनी बुआ की शादी की तैयारियों और खुशियों में मशगूल नैंसी शादी से एक दिन पहले स्कूल से घर के लिए जा रही थी कि रास्ते में 2 लड़के बाइक पर आए और बच्ची को अगवाह कर लिया। 25 मई से अगवाह हुई बच्ची 29 मई को खबरों से मालूम पड़ा कि बच्ची उन दरिंदों की हैवानियत का शिकार हो गई और अपनी जान से हाथ धो बैठी।

नरभक्षी के भेष में इंसानों ने, जिनको इंसान कहते हुए इंसानियत भी शर्मशार हो जाए। उस बच्ची के गले को रेता गया, नन्हे हाथों की कलाइयों को पकड़ हाथों की नसों को काटा गया। बच्ची की लाश को देख ऐसा लगता है मानो किसी गोश्त को खाया गया हो। इतनी दरिंदगी काफी नहीं थी शायद उन हैवानो के लिए जो उन्होंने उस नन्ही जान पर तेज़ाब दाल कर उसे जला भी दिया। क्या मानसिक स्थिति होगी उस बच्ची की जब वो जिंदगी की ऐसी लड़ाई लड़ रही होगी और सजा पा रही होगी उस गुनाह की जो उसने किया ही नहीं।

जिन लड़को ने नैंसी को अगवाह किया उनको गिरफ्तार कर लिया गया है। जांच से पता लगा है कि वो लड़के नहीं चाहते थे की नैंसी की बुआ की शादी हो। उस शादी को रोकने के लिए उन हैवानो ने ऐसा किया। अगवाह होने के बाद नैंसी के पिता ने FIR दर्ज कराई मगर छोटे कस्बे के लोगों की जान की कीमत शायद कम है शायद इसी वजह से पुलिस ने कोई कार्यवाई नहीं की। तिलयुगा नदी के किनारे बच्ची के शव की हालत देख किसी की भी रूह कांप सकती है। खबरों की माने तो बच्ची का पोस्टमार्टम हो गया है मगर उसमे बच्ची के साथ दुष्कर्म की बात अभी सामने नहीं आई है।

क्या महज बच्ची को मृत देखना ही उसके माँ बाप के लिए काफी नहीं था? क्या गुजरी होगी उन माँ बाप पर जब उन्होंने अपने नन्हे फूल को खिलने से पहले इतनी बुरी तरह कुचला हुआ देखा होगा?
क्यों बढ़ रही है देश में ऐसी वारदातें? इन वारदतों का कभी अंत होगा या नहीं? या नन्ही बच्चियां, लड़कियां, और औरतें ऐसे ही मर्दों की हैवानियत का शिकार होती रहेंगी? इंसानियत के पाठ सिर्फ क्या किताबों और प्रचारों में ही रहेंगे, लोगों में इंसानियत खत्म होती ही नजर आ रही है? कब होंगे अंत ऐसी दरिंदगी का?