डॉक्टर कफील के खिलाफ नहीं हैं पर्याप्त सबूत- इलाहाबाद हाईकोर्ट

नौ महीनों के इंतज़ार के बाद आखिरकार डॉ कफील को ज़मानत पर बरी कर दिया गया है। उन्हें गोरखपुर के अस्पताल में ऑक्सीजन की कमी से हुई 60 बच्चों की मौत के बाद गिरफ्तार किया गया था। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उनकी ज़मानत याचिका पर सुनवायी करते हुए कहा कि कोर्ट को डॉक्टर कफील खान के खिलाफ चिकित्सा लापरवाही के कोई सबूत नहीं मिले हैं। इसी वजह से कोर्ट ने उन्हें लगभग आठ महीनों बाद ज़मानत दे दी है। बता दें कि अगस्त 2017 में गोरखपुर के बीआरडी अस्पताल में ऑक्सीजन की सप्लाई रुकने की वजह से हुई बच्चों की मौत हुई थी।

जस्टिस यशवंत वर्मा ने गुरुवार को डॉ खान को ज़मानत देने के बाद अपने विस्तृत आदेश में कहा- रिकॉर्ड में इस तरह का कोई सबूत नहीं मिला है जिससे यह साबित होता हो कि याचिकाकर्ता अकेला इस मामले का दोषी है। यह भी एक तथ्य है कि इस मामले में कोई पूछताछ या जांच पूरी करने को नहीं बची है। बता दें कि कोर्ट ने डॉ खान को ज़मानत देने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार के हलफनामे को प्राथमिक कारण बताया।

राज्य सरकार ने अपने हलफनामे के 16वें पैराग्राफ में कहा है कि बच्चों की मौत ऑक्सीजन की कमी की वजह से नहीं हुई है। कोर्ट का कहना है कि खान को घटना के बाद से जेल में रहना पड़ा है। जबकि यह साफ नहीं है कि वह अस्पताल को मेडिकल ऑक्सीजन की सप्लाई करने वाले टेंडर प्रक्रिया का हिस्सा थे या नहीं। याचिकाकर्ता पिछले 7 महीनों से कस्टडी में है।

सरकारी वकील का कहना है कि अब जांच का कोई पहलू नहीं बचा है। जिससे यह साफ हो जाता है कि याचिकाकर्ता को कस्टडी में रखने की ज़रूरत नहीं है। कोर्ट का कहना है कि अपने हलफनामे में सरकार ने ऐसे कोई सबूत नहीं दिए हैं जिससे यह साबित हो या संकेत मिले कि याचिकाकर्ता ने गवाहों को प्रभावित करने या फिर सबूतों के साथ छेड़छाड़ करने की कोशिश की हो।

याचिकाकर्ता मेडिकल प्रैक्टिशनर होने के साथ ही सरकारी कर्मचारी है। जिसका पिछला कोई अपराधिक रिकॉर्ड नहीं रहा है। इसके अलावा मामले में मेडिकल ऑक्सीजन की सप्लाई करने वाले मुखिया मनीष भंडारी को पहले ही जमानत मिल चुकी है। सुप्रीम कोर्ट ने भंडारी को जमानत दे दी क्योंकि मामले में चार्जशीट दायर की जा चुकी है।