रामजी करेंगे बेड़ा पार!  

अयोध्या: राम मंदिर एक बार फिर ख़बरों में है। राजनीतिक गलियारों में राम के नाम की गूंज भी सुनाई देने लगी है। राम मंदिर के मुद्दे पर रैली, कार्यक्रम कॉन्फ्रेंस और टीवी पर बहस हो रहे हैं। अयोध्या में विश्व हिन्दू परिषद (विहिप) की धर्मसभा, शिवसेना के आशीर्वाद समारोह के बाद काशी में परमधर्म संसद में राम मंदिर निर्माण को लेकर आवाज बुलंद की गयी। बीजेपी के नेता भी लगातार बयान दे रहे हैं कि 2019 से पहले अयोध्या में राममंदिर का निर्माण होगा। विगत वर्षों की तरह इस बार भी छह दिसंबर को अयोध्या पर साम्प्रदायिक रंग चढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। बाबरी विध्वंस एक ऐसी घटना थी जिसने पूरे देश के धार्मिक सौहार्द को हिलाकर रख दिया था। हिंदू-मुस्लिमों के बीच एक गहरी दरार पैदा कर दी थी। 6 दिसंबर, 1992 की घटना ने विश्व के सबसे बड़े धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक राष्ट्र के सामने कई सवाल खड़े कर दिये थे। वे सारे सवाल आज तक अनुत्तरित हैं।

बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि का विवाद लगभग पांच सौ साल पुराना है

छह दिसंबर को विहिप द्वारा ‘संकल्प दिवस’ मनाने और मुस्लिम संगठनों द्वारा ‘काला दिवस’ मनाने की घोषणा की गयी है। वहीं वामदलों ने छह दिवस को देश व्यापी स्तर पर ‘संविधान एवं धर्मनिरपेक्षता संरक्षा दिवस’ के रूप में मनाने का फैसला किया है। बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि का विवाद लगभग पांच सौ साल पुराना है। विवाद का कारण यह कि बाबरी मस्जिद उस जगह पर बनी है जहां पांच हजार साल पहले भगवान राम का जन्म हुआ था। और यह कि वहां पहले एक मंदिर मौजूद था जिसे पहले मुगल बादशाह बाबर के एक सिपहसलार मीर बाक़ी ने ध्वस्त किया और ध्वंसावशेष पर मस्जिद खड़ी की जो बाद में बाबरी मस्जिद कहलाई। यहां मंदिर-मस्जिद को लेकर पहली बार हिंसा 1853 में हुई थी। उस समय यह नगर अवध क्षेत्र के नवाब वाजिद अली शाह के शासन क्षेत्र में था। मंदिर-मस्जिद का मामला पहली बार 19 जनवरी, 1885 को अदालत में पहुंचा। महंत रघुबर दास ने फैजाबाद अदालत में बाबरी मस्जिद से लगे राम चबूतरे पर राम मंदिर के निर्माण की इजाजत के लिए अपील दायर की थी। अदालत ने वह अपील ख़ारिज कर दी थी। 1989 के बाद यह उफान पर था। उस वक्त अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए बीजेपी ने व्यापक आंदोलन चलाया था। आंदोलन के नेतृत्व का ज़िम्मा आडवाणी के कंधों पर था। आडवाणी के नेतृत्व में रथ यात्राएं पूरे देश में निकाली गयीं, जिनका मकसद हिंदुओं को राम मंदिर के मुद्दे पर एकजुट करना रहा। हालांकि उस आंदोलन की शुरुआत विश्व हिंदू परिषद ने साधुओं के मदद से की थी, लेकिन 1980 के दशक में बीजेपी के लालकृष्ण आडवाणी ने उसे लपक लिया और राम मंदिर आंदोलन के हीरो बन गये।

इस आंदोलन में आडवाणी के साथ प्रमुख राजनीतिक चेहरे के रूप में डॉ मुरली मनोहर जोशी, कल्याण सिंह, उमा भारती, विनय कटियार उभरे। उधर मुस्लिम समुदाय भी बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी बनाकर आंदोलन और संघर्ष का रास्ता पकड़ लिया था। 6 दिसंबर, 1992 को अयोध्या में विवादित बाबरी ढाचे को गिरा दिया गया। उसके बाद देश के कई हिस्सों में सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे। दंगों की भयावहता मुंबई और सूरत में बहुत ज्यादा थी। इस मामले में आपराधिक केस के साथ-साथ दीवानी मुकदमा भी चला। अयोध्या में बाबरी विध्वंस के बाद राम जन्मभूमि आंदोलन की रफ़्तार कम हो गयी। घटना के साढ़े तीन साल बाद हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा ने सबसे बड़े दल के रूप में उभर कर पहली बार केंद्रीय सत्ता का स्वाद चखा। इन वर्षों में देश का राजनीतिक परिदृश्य भी बदल गया। इस बड़े बदलाव के केंद्र में अयोध्या का विवादित ही ढांचा है।  बीजेपी केंद्र के साथ 18 राज्यों की सत्ता में है, वहीं कांग्रेस के पास महज पांच राज्य बचे हैं।

यूपी में फिर बीजेपी पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता पर विराजमान है

इस घटना को 26 बरस गुजर गये लेकिन बार-बार इस मुद्दे की गूंज भारत की राजनीतिक गलियारे में सुनाई देती है। 1992 में यूपी में बीजेपी की सरकार थी। मुख्यमंत्री थे कल्याण सिंह। केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी। नरसिम्हा प्रधानमंत्री थे। यूपी में फिर बीजेपी पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता पर विराजमान है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हैं, जो हिंदुत्व का चेहरा भी हैं। इतना ही नहीं केंद्र में भी बीजेपी की सरकार पूर्ण बहुमत के साथ है। नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री हैं। संघ परिवार, राममंदिर से जुड़े संगठन और समर्थक लगातार मंदिर बनाने का दबाव बनाने में जुटे हुए हैं। बीजेपी भी चाहती है कि यह मुद्दा रंग पकड़ ले, ताकि वोटों का धुर्वीकरण हो। पार्टी के रणनीतिकार मानते हैं कि अयोध्या की जमीन हिन्दुत्व की खेती के लिए पर्याप्त उर्वर है और उस पर थोड़ी-सी मेहनत से ही वोटों की फसल लहलहा सकती है।

मंदिर-मस्जिद विवाद पर चुनावी बिसातें बिछायी जाती रही हैं। जब भी चुनाव नजदीक होता है तो राम लला के मंदिर मुददे को बड़ी ही शिद्दत से उठाया जाता है लेकिन चुनावी रंगत खत्म होते ही ये मुद्दा गायब हो जाता है। राम मंदिर के नाम पर शुरू हुई यह सियासत यकीनन अगले चुनाव को ध्यान में रखते हुए शुरू हुई है। कांग्रेस पर भी राम के नाम का सहारा लेने का (यानी सॉफ्ट हिंदुत्व अपनाने का) आरोप लग रहा है। चुनाव विधानसभा का हो या लोकसभा का इस मुद्दे ने बीजेपी को लगातार सहारा दिया है।  2014 में भी बीजेपी ने राम मंदिर के निर्माण का वादा किया था, हालाँकि उस मंदिर के बजाय विकास को मुद्दा बनाया। चुनावी अभियान का मुख्य मुद्दा देश का विकास और बदलाव था। पार्टी ने देशभर में वोटर को खास कर नौजवानों यह यकीन दिलाया था कि उसके पास तेज विकास का मॉडल मौजूद है और मोदी उनकी आकांक्षाओं को पूरा करेंगे। घपले-घोटालों में घिरी कांग्रेस सरकार के लिए मोदी के विकास के एजेंडे को चुनौती दे पाना संभव नहीं हुआ।

मई 2014 में भाजपा सरकार बनने के बाद मोदी सरकार ने आर्थिक मोर्चे पर बड़े और अहम फैसले लिए। आर्थिक सुधार की इन कवायदों से आर्थिक आंकड़े अपने शीर्ष पर पहुंचे तो जरूर लेकिन चौथे साल में ही आंकड़ों में गिरावट का दौर शुरू हो गया। ऐसी स्थिति में केंद्र की मोदी सरकार को 2019 में प्रस्तावित आम चुनावों के वक्त देश की अर्थव्यवस्था से उसे ऐसे आंकड़े नहीं मिलने जा रहे जिसे अपनी उपलब्धि बताकर सत्ता पर दोबारा काबिज हो सके।  मोदी मैजिक  भी फीका पड़ा है, इसलिए अयोध्या के मुद्दे को आगे रखकर पार्टी आगामी चुनाव में उतरना चाहती है। ऐसा लग रहा है कि साढ़े चार साल के बाद राजनीति फिर घूम फिर मंदिर के मुद्दे पर पहुंच गयी है। विकास पर बात करने की जगह सारी बहस राम मंदिर पर केंद्रित होता दिख रहा है। अहम मुद्दे फिर पीछे छूट रहे हैं और मंदिर चुनावी मुद्दा बनने लगा है। पार्टी के कुछ नेता हिंदुत्व और राम को विकास का पर्याय बताने में लगे  हैं। पार्टी एक बार फिर राम नाम के सहारे चुनावी वैतरणी पार करना चाहती है।

युवाओं को हर साल दो करोड़ रोजगार देने के वादे पर सरकार विफल रही है

दरअसल राम मंदिर का मुद्दा उछालकर जमीनी मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश की जा रही है। वैसे भी किसान, मजदूर और बेरोजगार इस सरकार के लिए कोई मुद्दा नहीं। आर्थिक मोर्चे पर सरकार को लगातार सवालों का सामना करना पड़ा है। युवाओं को हर साल दो करोड़ रोजगार देने के वादे पर सरकार विफल रही है। मोदी सरकार किसानों और महंगाई की मार झेलने वाले आम लोगों से अपने चुनाव घोषणा-पत्र में किए किसी भी वादे को पूरा नहीं कर पाई  है। किसानों को फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य देने की जो घोषणा की गई, वह जमीन पर कहीं नहीं उतरी। राम मंदिर के शोर में देश के विभिन्न हिस्सों से आये उन किसानों की आवाज भी दब गयी जो देश के सामने अपना दुख-दर्द रखने दिल्ली के रामलीला मैदान पहुंचे थे। देश के कई राज्यों से जुटे यह किसान दिल्ली की सड़कों पर चीख-चीख कर अपनी मांगों को पूरा किए जाने की गुहार लगा रहे थे, लेकिन उनकी यह गुहार न तो सरकार के कानों तक पहुंची और न ही मेनस्ट्रीम मीडिया के। किसानों ने नाराजगी जताते हुए कहा कि हमारे लिए दो वक्त की रोटी का इंतजाम करना मुश्किल हो रहा है लेकिन सरकार राम मंदिर के जरिए लोगों का ध्यान किसानों के मुद्दों से भटकाना चाहते हैं। किसानों का कहना है कि उन्हें राम मंदिर के बजाय कर्ज माफी और अपने उत्पादों का लाभकारी मूल्य चाहिए। किसान लगातार अपनी मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे हैं, लेकिन सरकार ने उनकी मांगों पर ज़रा भी गंभीरता नहीं दिखा रही है। किसानों के आंदोलन में मंच साझा कर देश के विपक्ष ने एकजुटता का प्रदर्शन जरूर किया।

अयोध्या का विवादित ढांचा मात्र राजनीतिक मुद्दा बन कर रह गया है। हर पार्टी अयोध्या के विवादित ढांचे पर बयानबाजी तो करती है लेकिन कोई इस मुद्दे का निदान नहीं चाहता। स्मरण रहे कि विवादित ढांचा गिराये जाने के एक साल बाद जनवरी 1993 में नरसिम्हा राव सरकार के द्वारा इस मसले पर अध्यादेश लाया गया था। तत्कालीन राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने 7 जनवरी 1993 को इसे मंजूरी दी थी। तब बीजेपी ने सरकार का पुरजोर विरोध किया था। अब जबकि मोदी सरकार अध्यादेश लाने का मन बना रही तो कांग्रेस कह रही है कि सरकार को सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार करना चाहिए। राम मंदिर निर्माण से जनता का भावनात्मक जुड़ाव है। हिन्दू धर्मावलम्बियों का मानना है सारे ऐतिहासिक सबूत मंदिर के पक्ष में हैं लेकिन राम लला तिरपाल में रहने को मजबूर हैं। आने वाले दिनों में अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए कानून बनाने या फिर अध्यादेश लाने की मांग और प्रबल होने वाली है। बहरहाल सुप्रीम कोर्ट में राम मंदिर मामले की निर्णायक सुनवाई होने वाली है। अदालत का मानना है कि अगर संत समाज और सभी धार्मिक-राजनीतिक दलों के साथ मिल-बैठ कर कोई सर्वमान्य हल निकाल लिया जाए, तो मंदिर निर्माण की राह सुगम हो जाएगी।