DNA ANALYSIS: विकास दुबे के एनकाउंटर का ‘पोस्टमार्टम’

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नई दिल्ली: विकास दुबे के एनकाउंटर पर देश दो हिस्सों में बंट गया है. एक तरफ वो लोग हैं, जो विकास दुबे एनकाउंटर पर सवाल उठा रहे हैं और दूसरी तरफ वो लोग हैं, जो ये कह रहे हैं कि विकास दुबे जैसे अपराधियों का यही अंजाम होना चाहिए. ये लोग इस एनकाउंटर से बहुत खुश हैं. इसलिए आज आपको ये समझना चाहिए कि हमारे देश के लोग एनकाउंटर से इतना खुश क्यों होते हैं? एनकाउंटर पर तालियां क्यों बजती हैं? और इसे सही क्यों ठहराया जाता है. असल में कई बार स्थितियां ऐसी बन जाती हैं कि एनकाउंटर के जरिए मिलने वाला इंस्टंट जस्टिस यानी तत्काल न्याय ही एक मात्रा उपाय लगने लगता है और आप सोचने पर मजबूर हो जाते हैं कि हमने ये नियम कायदे किसके लिए बनाए थे और क्या ये नियम कायदे अपने मकसद में कामयाब हो पाए?

विकास दुबे को अपने एनकाउंटर का पहले से ही डर था, इसलिए उसने कैमरों के सामने सोच समझ कर एक तरह से सरेंडर किया था. शायद उसे उम्मीद थी कि वो ऐसा करके एनकाउंटर से बच जाएगा, लेकिन अपनी कहानी का जो क्लाइमेक्स, विकास दुबे सोच रहा था, वो क्लाइमेक्स, उत्तर प्रदेश पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स यानी STF ने शुक्रवार को सुबह-सुबह बदल दिया.

आतंक का अंत सिर्फ 15 मिनट में
गुरुवार तक बहुत लोगों को यकीन नहीं था कि सरेंडर करने के बाद अब विकास दुबे का एनकाउंटर होगा. क्योंकि उसे उज्जैन से कानपुर ले जा रही STF की टीम पर लगातार नजर थी. उसके बारे में पल-पल की खबरें आ रही थीं. मीडिया की गाड़ियां रात भर लगातार पीछा कर रही थीं. लेकिन विकास दुबे का अंत करने के लिए यूपी STF को शुक्रवार सुबह सिर्फ 15 मिनट ही लगे.

इन 15 मिनट में किसी को पता नहीं चला कि आखिर क्या हो रहा है. खबर आई कि विकास दुबे का एनकाउंटर हो गया है. पुलिस के मुताबिक जिस गाड़ी में विकास दुबे बैठा था, वो एक हादसे की वजह से पलट गई. इसी हादसे में विकास दुबे को मौका मिल गया. उसने पुलिसकर्मियों से पिस्तौल छीन ली और भागने की कोशिश करने लगा.

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पुलिस ने विकास दुबे को सरेंडर करने के लिए कहा, लेकिन उसने पुलिसकर्मियों पर फायरिंग कर दी और पुलिस ने जवाबी फायरिंग में विकास दुबे को मार गिराया. शुक्रवार सुबह से बहुत सारे लोग एनकाउंटर की पुलिस स्टोरी को पूर्व लिखित पटकथा बता रहे हैं, और इस एनकाउंटर पर सवाल उठा रहे हैं. ये वही लोग हैं, जो गुरुवार तक ये कह रहे थे कि विकास दुबे को बचाया जा रहा है. अब जब उसका एनकाउंटर हो गया तो यही लोग कह रहे हैं कि उसे मार क्यों दिया?

एनकाउंटर पर उठे सवाल
अब आप सोचिए कि हमारा देश भी कितना अजीब है और कैसे हमारे देश में लोगों के विचार रातों रात बदल जाते हैं. विकास दुबे ने जिस दिन 8 पुलिसवालों की हत्या की उस दिन उत्तर प्रदेश पुलिस से सवाल पूछे गए कि उसे भागने क्यों दिया गया? फिर जब वो भाग गया तो पूछा गया कि उसे पकड़ा क्यों नहीं गया और जब पकड़ा गया तो कहा गया कि ये गिरफ्तारी नहीं बल्कि सरेंडर है और जब वो एनकाउंटर में मार दिया गया तो यही लोग सवाल पूछ रहे हैं कि विकास दुबे को मार क्यों दिया गया?

कई लोगों को लगता है कि एनकाउंटर एक गलत प्रक्रिया और गलत परंपरा है, लेकिन कई लोग इसे बिल्कुल सही मानते हैं. हमें इस बात को भी समझना होगा कि आखिर हमारे देश में लोग एनकाउंटर का समर्थन क्यों करते हैं?

आज हम आपको पिछले वर्ष की कुछ तस्वीरें याद दिलाना चाहते हैं. ये तस्वीरें हैदराबाद की हैं जहां पुलिस ने गैंगरेप और मर्डर के आरोपियों का एनकाउंटर कर दिया था और इसके बाद लोगों ने पुलिस के लिए तालियां बजाई थीं. लोगों ने जश्न मनाया था और पुलिसकर्मियों पर फूल बरसाए थे.

हैदराबाद में एक महिला डॉक्टर की गैंगरेप के बाद हत्या कर दी गई थी और पुलिस ने उसी जगह पर ले जाकर हत्यारों का एनकाउंटर कर दिया था. तब सिर्फ हैदराबाद में ही नहीं बल्कि पूरे देश में जश्न मनाया गया था. ज्यादातर लोग यही कह रहे थे कि ऐसे अपराधियों का यही अंजाम होना चाहिए.

ऑन द स्पॉट फैसला कितना सही? 
एनकाउंटर के ऐसे मामलों में हमेशा बहस होती रही है, कि ऑन द स्पॉट फैसला करके सही किया गया या गलत. इस बहस में निष्कर्ष निकाला जाता है कि सड़क पर एनकाउंटर के जरिए मिलने वाला न्याय हमारे लोकतंत्र के लिए आदर्श न्याय नहीं हो सकता है. लेकिन लोग ये भी मानते हैं कि ऐसे एनकाउंटर से अपराधियों में खौफ होता है कि उनकी उम्र ज्यादा लंबी नहीं है. कभी ना कभी ऐसा दिन आएगा जब वो मार दिए जाएंगे.

लेकिन सवाल तो ये भी है कि अपराधियों के अंदर ये खौफ, बिना एनकाउंटर के क्यों नहीं आता? और अगर आम जनता अपराधियों से निपटने के लिए एनकाउंटर को ही आदर्श मानने लगी है तो फिर ये सवाल हमारे सिस्टम के लिए है, कि क्यों लोगों के अंदर ऐसी सोच आ गई है.

न्याय व्यवस्था में खामियां
हमें इस पर भी ध्यान देना होगा कि हमारी न्याय व्यवस्था में क्या कमियां हैं. देश की निचली अदालतों में किसी भी मामले की सुनवाई में औसतन साढ़े 9 वर्ष तक का समय लग जाता है. हाई कोर्ट्स में किसी केस की सुनवाई औसतन 4 वर्ष से अधिक समय तक चलती है.

लोग ये तो कहते हैं कि कानून के हाथ बहुत लंबे होते हैं, लेकिन कानून के इन लंबे हाथों से विकास दुबे जैसे अपराधी अक्सर फिसल जाते हैं. क्योंकि ऐसे अपराधियों के राजनैतिक कनेक्शन होते हैं और इनका ऐसा डर होता है कि कोई इनके खिलाफ अदालतों में गवाह बनने की हिम्मत नहीं करता.

आज अगर विकास दुबे का एनकाउंटर नहीं होता और वो जेल जाता, इसमें दो बातें होतीं. या तो वो जेल से अपने अपराध का साम्राज्य चलाता या फिर वो पहले की तरह ही जेल से फिर छूट जाता.

ये संभव था कि वो अपना केस लड़ने के लिए बड़े-बड़े वकीलों को रख लेता. उसके वकील ये साबित कर देते कि 8 पुलिसकर्मियों की हत्या करने वाला विकास दुबे हत्या की रात घटनास्थल पर मौजूद ही नहीं था. अगर विकास दुबे इस बार भी बच जाता, तो बहुत मुमकिन था कि वो बड़ा नेता बन जाता. कुछ वर्षों में वो अपने इलाके का विधायक बन जाता और शायद किसी सरकार में मंत्री भी बन जाता.

एनकाउंटर को कुछ लोगों ने बताया फेक
इस एनकाउंटर पर हमारे देश के कई लोग सवाल उठा रहे हैं. इन लोगों ने मान लिया है कि ये एनकाउंटर फेक है, यानी फर्जी है. लेकिन इन्हें शायद ये नहीं पता कि जब हत्या जैसे अपराध का कोई आरोपी पुलिस के हथियार छीनकर भागता है तो पुलिस उसे गिरफ्तार करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य होती है. CRPC की धारा 46 (2) और 46 (3) के मुताबिक पुलिस की गिरफ्त से भागने वाले ऐसे खूंखार अपराधियों पर आत्मरक्षा में गोली भी चलाई जा सकती है. फिर चाहे इस कोशिश में अपराधियों की जान ही क्यों ना चली जाए. इतना ही नहीं जो अपराधी ये जानते हैं कि उन्हें अदालत से सजा-ए-मौत मिलना तय है तो वो पुलिस की गिरफ्त से भागने की हर संभव कोशिश करते हैं और इसके लिए वो किसी की जान भी ले सकते हैं. इसलिए आज इन लोगों को ये सोचना चाहिए कि अगर ये अपराधी भाग जाता तो ये कानून व्यवस्था और समाज के लिए कितना बड़ा खतरा बन सकता था और अगर विकास दुबे पुलिस की गिरफ्त से भाग जाता तो खुद को बुद्धिजीवी कहने वाले यही लोग पुलिस की आलोचना कर रहे होते और पूरे पुलिस विभाग पर लापरवाही का आरोप लगाते.

जो लोग इस एनकाउंटर पर ये कहकर सवाल उठा रहे हैं कि ये एक अपराधी के मानव-अधिकारों का उल्लंघन है. क्या उन्हें पीड़ितों के मानव-अधिकार जरूरी नहीं लगते?

विकास दुबे कोई छोटा-मोटा अपराधी नहीं था. एक गैंगस्टर के रूप में उसका करियर तीस वर्षों का था और इस दौरान उस पर करीब 60 मुकदमे दर्ज हुए. जिनमें हत्या के भी पांच मुकदमे थे. विकास दुबे तब पहली बार इतनी चर्चा में आया जब उसने वर्ष 2001 में कानपुर के शिवली पुलिस स्टेशन के अंदर बीजेपी के एक बड़े नेता की दिन दहाडे़ हत्या कर दी थी.

बीजेपी के इस नेता का नाम था संतोष शुक्ला जिन्हें उस समय की उत्तर प्रदेश सरकार में राज्य मंत्री का दर्जा हासिल था. इस हत्याकांड के कुछ महीनों के बाद विकास दुबे ने एक स्थानीय अदालत में सरेंडर कर दिया और कहा जाता है कि जिस समय विकास दुबे सरेंडर कर रहा था तब उसके साथ कई नेता भी मौजूद थे और कुल मिलाकर ये साबित करने की कोशिश की जा रही थी कि पुलिस विकास दुबे को नहीं पकड़ पाई और उसने खुद सरेंडर किया है.

विकास दुबे अरेस्ट या सरेंडर? 
ठीक वैसे ही जैसे गुरुवार को उज्जैन में विकास दुबे ने ये साबित करने की कोशिश की थी कि पुलिस उसे नहीं पकड़ सकती और वो खुद आत्मसमर्पण कर रहा है. उस समय भी विकास दुबे पर 50 हजार रुपये का इनाम घोषित किया गया था और उसके एनकाउंटर की तैयारी कर ली गई थी. लेकिन सरेंडर के बाद जब पुलिस विकास को लेकर थाने पहुंची तो स्थानीय लोगों ने थाने को घेर लिया. क्योंकि लोगों को डर था कि पुलिस कहीं विकास दुबे का एकाउंटर ना कर दे.

लेकिन संतोष शुक्ला हत्याकांड में 4 साल जेल में रहने के बाद उसे रिहा कर दिया गया. और इसकी वजह जानकर आप हैरान रह जाएंगे. इसकी वजह ये थी कि जो 25 पुलिस वाले इस हत्याकांड के गवाह थे वो एक-एक करके मुकर गए और यहां तक कि ऐसा पहली बार हुआ जब किसी मामले का जांच अधिकारी खुद अपनी ही जांच से पलट गया. इतना ही नहीं संतोष शुक्ला के गनर, पर्सनल स्टाफ और उनके साथ चलने वाले सुरक्षा कर्मियों ने भी विकास दुबे के पक्ष में गवाही दी थी.

इस हत्याकांड के 4 साल बाद जब विकास दुबे को रिहा किया गया उस समय उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार थी और मुख्यमंत्री थे मुलायम सिंह यादव. कहा जाता है कि संतोष शुक्ला हत्याकांड के बाद ही विकास दुबे नेताओं की नजरों में चढ़ गया और उसे भरपूर राजनैतिक संरक्षण दिया जाने लगा और नेता उससे पूरा काम लेने लगे.

विकास दुबे को राजनेताओं का संरक्षण
विकास दुबे को राजनेताओं का संरक्षण इस कदर हासिल था कि वो खुद एक दिन एक बड़ा नेता बनना चाहता था. और कहा जाता है कि विकास दुबे की पत्नी ऋचा दुबे को समाजवादी पार्टी की आजीवन सदस्यता भी हासिल थी. हालांकि समाजवादी पार्टी इससे इनकार कर रही है. इसके अलावा 2002 में ही विकास दुबे ने कानपुर के एक स्थानीय नेता लल्लन बाजपेयी पर जानलेवा हमला किया था.

वर्ष 2000 में एक स्कूल प्रिसिंपल की हत्या में भी विकास दुबे का नाम आया था और वर्ष 1992 में भी एक युवक की हत्या के मामले में उसकी गिरफ्तारी हुई थी. लेकिन इस दौरान 10 से 12 बार जेल जाने के बावजूद वो कभी सबूतों के अभाव में छूट जाता था या फिर उसे आसानी से बेल मिल जाती थी, या फिर पुलिस उसके खिलाफ मजबूत केस बना ही नहीं पाती थी.

अब जो लोग विकास दुबे के एनकाउंटर पर इतना शोर मचा रहे हैं उन्हें सोचना चाहिए कि अगर विकास दुबे जेल चला जाता तो उसके लिए जेल से बाहर आना या जमानत हासिल करना कौन सा मुश्किल काम था और शायद आने वाले कई वर्षों तक पूरा सिस्टम मिलकर भी विकास दुबे को गुनहगार साबित नहीं कर पाता.

यानी विकास दुबे अचानक ही रातों रात गैंगस्टर नहीं बना बल्कि धीरे-धीरे पुलिस और नेताओं के गठबंधन ने उसे एक बाहुबली में बदल दिया और वो अपने इशारों पर सिस्टम को नचाने लगा.

आठ पुलिसवालों का कातिल और 5 लाख रुपये का इनामी गैंगस्टर, विकास दुबे सात दिन तक पुलिस से बचता रहा. पुलिस एनकाउंटर से बचने के लिए उसने उज्जैन के महाकाल मंदिर में सरेंडर का नाटक भी किया. लेकिन वो अपने काल से बच नहीं पाया.





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