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क्या मुगल बादशाहों में से किसी ने भारत की आजादी की लड़ाई लड़ी थी?

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क्या मुगल बादशाहों में से किसी ने भारत की आजादी की लड़ाई लड़ी थी?

अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह द्वितीय जिसे ज़फर के नाम से भी जाना जाता है. 1862 में बर्मा में एक ब्रिटिश जेल में मृत्यु हो गई थी। अंतिम वंश के रूप में जो सोलहवीं शताब्दी तक वापस आ गया था. वह अपने पहले के वर्षों में एक सांस्कृतिक रूप से समर्थ था लेकिन जैसा कि ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत के अधिक हिस्से पर अपना नियंत्रण बढ़ाया था. उनका शासन स्पष्ट रूप से समाप्त हो रहा था।

उनके ब्रिटिश अधिकारियों के खिलाफ सिपाहियों की आपसी दुश्मनी ने दिल्ली की घेराबंदी की, प्रत्यक्ष ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की स्थापना की और जफर के सम्राट के रूप में किसी भी ढोंग का अंत किया। अंग्रेजों से पहले भारत पर मुगलों का शासन था और उन्होंने हमारे राजनीतिक और आर्थिक लाभ के लिए भारतीय जमीन का इस्तेमाल किया। जब अंग्रेज 1600 में व्यापार के उद्देश्य से भारत में दाखिल हुए तो मुगल सम्राट को इस बात का अंदाजा नहीं था कि ये अंग्रेज उन्हें व्यापार के बहाने अपने राज्य से निकाल देंगे।

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व्यापार की आड़ में देश पर अपना अधिकार जताने की रणनीति ने धीरे-धीरे काम किया। बात करें 1857 के विद्रोहियों ने जब शहर पर कब्जा जमाया तो ब्रिटिश अधिकारियों ने इसे विस्फोट से उड़ाने का फैसला कर लिया। वे नहीं चाहते थे कि गोला-बारूद विरोधियों के हाथ लगे। अभी जो बची-खुची इमारत दिख रही है यही रह गई। आज इसके पास ही एक पोस्ट ऑफिस है माना जाता है कि यह बिल्डिंग सन् 1885 में बनाई गई थी।

यह बिल्डिंग मैग्जीन गेट के कंपाउंड वाली जगह पर बनाई गई। ब्रिटिश सैनिकों ने शाहजहांनाबाद शहर में घुसने के लिए कश्मीरी गेट का इस्तेमाल किया था। इस गेट पर कई गोले बरसाए गए थे। इससे इस इमारत को काफी नुकसान पहुंचा था। लाल किले पर कब्जा करने के बाद इसके अंदर की कुछ इमारतों को भी तहस-नहस किया गया था। हालांकि बाद में इसे ठीक किया गया। 1857 में देश की आजादी की पहली लड़ाई का एक प्रमुख केंद्र दिल्ली भी थी।

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यह लड़ाई अन्तिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के नेतृत्व में लड़ी गई थी। हालांकि, उस वक़्त मुगल साम्राज्य की बस आखिरी सांस ही बची थी। इस लड़ाई में अंग्रेजों ने विद्रोहियों को हराकर लाल किले पर कब्जा जमा लिया और बादशाह बहादुरशाह जफर को गिरफ्तार कर देश निकाला दे दिया था। उन्होंने सन् 1862 में रंगून में अंतिम सांस ली। किले पर अधिकार के साथ ही दिल्ली पर अंग्रेजों का कब्जा हो गया और मुगल साम्राज्य इतिहास के पन्नों तक सीमित हो गया।

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