त्रेतायुग में राम-भरत मिलाप की यादें हुई जीवंत

चित्रकूट: प्रभु श्रीराम की तपोभूमि के भरत मिलाप मंदिर में गुरूवार को त्रेतायुग की याद ताजा हो गई। जब प्रभु श्रीराम से भ्राता भरत ऐसे मिले कि लोगों की आंखें नम हो गई। इस लीला को देखने के लिए लोग उमड़ पड़े। अयोध्या से आई भरत यात्रा में शामिल संतों का धर्मनगरी में जोरदार स्वागत हुआ। जगह-जगह उनका फूलमाला से अभिवादन किया गया।

अयोध्या से आई भरत यात्रा ने गुरूवार को कामदगिरि की परिक्रमा लगाई। परिक्रमा पथ में स्थित भरत मिलाप मंदिर में इस दौरान भगवान राम और भरत मिलन की लीला का मंचन किया गया। जिसको देख लोग आंसू नहीं रोक सके। यहां पर मंदिर के महंत राममनोहरदास महराज ने यात्रा में शामिल संत महंतों का स्वागत किया और कहा कि प्रतिवर्ष के भांति अयोध्या से आई भरत यात्रा ने जो लीला का मंचन किया है वह त्रेतायुग की याद ताजा कर देती है। वहीं यात्रा का नेतृत्व कर रहे अयोध्या छावनी के उत्तराधिकारी महंत कमलदास महराज ने कहा कि इस यात्रा का आयोजन 45 वर्ष से हो रहा है। जिसका शुभारंभ मणिराम दास छावनी के महंत नृत्यगोपाल दास ने किया था। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम ने अपने आदर्शों और मर्यादित जीवन के द्वारा ही मानवता की रक्षा कर रामराज्य की स्थापना की।

भरत जी ने तपस्वी भेष धारण किया

उनके इस संकल्प कि पूर्ति में अनुज भरत जी सहायक सिद्ध हुए। 14 वर्षों तक भगवान श्रीराम ने जहां वनवासी जीवन व्यतीत कर धर्म की स्थापना की। वहीं भरत जी ने चित्रकूट आकर उनकी चरण पादुका को सिंहासन पर विराजमान कर स्वयं तपस्वी भेष धारण किया और अयोध्या की राजसत्ता का 14 वर्षों तक संचालन किया। ऐसे चरित्र और प्रेम की स्थापना को लेकर ही भरत यात्रा का आयोजन प्रत्येक वर्ष किया जा रहा है। उन्होंने बताता कि 25 नवम्बर को अयोध्या से चलकर गुरूवार को भरत यात्रा चित्रकूट पहुंची है। इस यात्रा में  महंत बजरंगदास महाराज गोवर्धन निवास वासुदेव घाट, महंत रामशरण दास रामायणी व्यास अवधेश निवास, महंत रामगोपाल दास जानकीरमण कुंज झूसी प्रयाग व स्वामी छैलबिहारी आदि शामिल है।

भरत मिलाप मंदिर में भगवान राम से मिलते भरत जी।

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कामदगिरि प्रमुख द्वार में हुआ स्वागत

कामदगिरि प्रमुख द्वार में अधिकारी मदनगोपाल दास ने भरत यात्रा में आए साधु संतों का स्वागत किया। यात्रा में शामिल संतों का फूलमाला से अभिवादन किया। इस मौके पर देवीदास, नागाजी महराज, नरसिंह दास, मोहनदास, नंदकिशोर दास, मोहनदास, हनुमान दास, महावीर दास, रामसखा दास और राधेश्याम दास आदि मौजूद रहें।

मंदाकिनी तट पर हुई धर्म सभा

अयोध्या से आई भरत यात्रा विभिन्न धार्मिक स्थलों का भ्रमण कर मंदाकिनी तट रामघाट में धर्म सभा की। भरत यात्रा का नेतृत्व कर रहे अयोध्या श्रीमणिराम दास छावनी के उत्तराधिकारी महंत कमल नयन दास ने कहा कि भरत का चरित्र समुद्र के समान अगाध है। अयोध्या का राजपाट छोड़ कर वे भाई राम से मिलने पैदल ही चित्रकूट दौड़ पड़े। महंत दिव्यजीवन दास ने कहा कि भरत के समान शीलवान भाई इस संसार में मिलना दुर्लभ है। यज्ञवेदी मंदिर के महंत रामदुलारे दास ने कहा कि भरत जी एक सन्यासी थे। भरत जी प्रभु राम से अयोध्या लौटने का आग्रह करते हैं, लेकिन जब वे नहीं लौटते और अपनी चरण पादुका देकर भरत को अयोध्या विदा करते हैं तो वह तपस्वी जीवन बिताते हुए श्रीराम के आगमन का चौदह वर्ष इंतजार करते हैं।

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कामदगिरि प्रमुख द्वार के संत मदनगोपाल दास ने कहा कि रामघाट वह स्थल है जहां पर भरत मिलाप के बाद सभा का आयोजन हुआ था। जिसमें प्रभु राम, सीता, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघन सहित तीनों माताओं और अयोध्या से आए लोगों ने भाग लिया था। उसी परम्परा का आज भी निर्वहन होता है। सभा के बाद अयोध्या से आए संत महंतों ने भी मंदाकिनी गंगा आरती में भाग लिया। गीत संगीत के बीच सभी ने मां मंदाकिनी की आरती कर पूजन किया। इसके बाद भरत मंदिर में भगवान राम की चरण पादुका भरत को सौपने की लीला का मंचन किया हुआ।